श्वेतप्रदर क्या होता है लक्षण प्रकार और पहचान / What is Leucorrhoea, Symptoms, Types and Identification

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Leucorrhoea / श्वेतप्रदर क्या होता है

प्रत्येक स्वस्थ स्त्री की योनी की दीवारों से अल्पमात्रा में एक प्रकार का स्राव निकलता रहता है (जिससे योनि गीली रहती है।) जब यह स्राव अधिक मात्रा में उत्पन्न होने लगता है तो बहकर योनि द्वार तक आ जाता है तथा बाहर निकलने लगता है, तब इसे 'श्वेतप्रदर' (ल्यूकोरिया) कहा जाता है। स्त्री की योनि (वैजाइना Vagina) से एक म्यूकस (Mucus) के सदृश अथवा Mucoid द्रव (जो एक Glycoprotein है) स्वभावता/ प्राकृत निकलता है। उसमें पूय (Pus) या ल्यूकोसाइट्स (Leucocytes) की उपस्थिति बिल्कुल नहीं होती है। जब यह कुछ अधिक मात्रा में निकलने लगता है तो यही 'श्वेदप्रदर' कहलाता है। इस द्रव का कार्बोहाइड्रेट का अंश योनि मार्ग में विद्यमान Doderlein's Dacilli के द्वारा लेक्टिक एसिड के रूप में परिवर्तित हो जाता है। इसलिए योनि मार्ग में विद्यमान इस द्रव का PH4 से अधिक नहीं होता। सर्विक्स (Cervix) और योनि (वैजाइना) के अन्दर की झिल्ली के सेलों का Karatinised होना और उनसे 'म्यूकस' का रिस-रिसकर निकलना (Transudation का होना) यह सब एस्ट्रोजेन (Aestrogen) की प्रेरणा से होता है। इस प्रकार साधारण श्वेतप्रदर का होना कोई विशेष रोग नहीं है। किन्तु हाँ यदि योनि मार्ग से निकलने वाले द्रव में पूय (Pus) के सेल्स हो अथवा उसमें पूयजनक जीवाणु हों तो उसे इन्फेक्टिवल्यूकोरिया (Infective Leucorrhoea) अथवा इन्फेक्टिव वेजाइनाइटिस (Infective Vaginits) कहा जाता है। ऐसा एक तो Trichomonas Vaginalis के कारण अधिक होता है। 35-40 वर्ष की आयु की स्त्री में योनि के अन्दर का PH ऊँचा हो जाए तो इस जीवाणु का संक्रमण हो सकता है। इससे उत्पन्न स्राव क्रीम के रंग हल्के से हरे रंग का पतला झागदार होता है। इसके विक्षोभक होने के कारण 'वल्वा' (Vulva) पर की त्वचा में कुछ लालिमा और खाज के लक्षण हो जाते हैं।

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  1. ‘कैण्डिडा' (Candida) एक फुई या फंगस (Fungus) है जो वैजाइना में (जहाँ का स्राव एसिड (Acid) है तथा जहाँ ग्लाइकोजेन (Glycogen) भी उपस्थित वहाँ इसका संक्रमण सुगमता से हो जाता है। इससे योनिस्राव मात्रा में अधिक होने लगता है। वल्वा पर लाली तथा खुजली के लक्षण होते हैं।
  2. वृद्धा स्त्रियों के रक्त के अन्दर Oestrogen की मात्रा के कम हो जाने से योनि के अन्दर की 'इपीथीलियम' क्षीण होकर पतली पड़ जाती है। उसमें 'लेक्टिक एसिड' के बनने की प्रक्रिया मन्द हो जाती है जिससे कुछ जीवाणुओं का मिक्सड इन्फेक्शन हो जाता है। परिणामतः योनि के अन्दर शोथ होकर पूय युक्त श्वेत सा स्त्राव होने लगता है। बाहर ‘वल्वा' भी कुछ सूज जाता है तथा कुछ-कुछ यूरेथ्राईटिस (Urathritis) भी हो जाता है
  3. इस रोग (ल्यूकोरिया) से प्रत्येक आयु वर्ग की स्त्रियाँ ग्रस्त हो सकती हैं। यह स्त्रियों में पाया जाने वाला लगभग एक सर्वव्यापी रोग तथा प्राचीन रोग है। सत्यता तो यही है कि यह स्वयं में कोई रोग नहीं बल्कि अन्य रोगों का लक्षण है। पोषक तत्वों (मुख्यतः विटामिन्स और कैल्शियम) की कमी, अत्याधिक चिन्ता, शारीरिक कमजोरी, बार-बार प्रसव या गर्भपात तथा योनि में गोनोकोक्कस, सिफलिस, हर्पीज, क्लेमाईडिया, ट्राइकोमोनास केडिक जैसे विषाणुओं तथा जीवाणुओं के संक्रमण इस रोग के जनक/कारण हैं, जैसा कि हम ऊपर लिख आये हैं कि यह रोग किसी भी आयु वर्ग की महिला को हो सकता है, किन्तु रजोनिवृत्ति के उपरान्त शरीर में इस्ट्रोजन हारमोन की कमी हो जाने से इसके संक्रमण (इन्फेक्शन) की आशंका बढ़ जाती है। इसी प्रकार मधुमेह, खांसी तथा दमा रोग से पीड़ित स्त्रियों में भी इस रोग के होने की आशंका बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन करना, कॉपर-टी या गर्भनिरोधक जैली अथवा नायलोन का जांघिया पहनने, योनि की सफाई ठीक प्रकार से न रखने पर भी इस रोग के होने का खतरा बढ़ जाता है। गर्भाशय ग्रीवा की सूजन, मांस के बढ़ने से बना पालिप और सतही छीजन Servical Erosion जैसे आम रोग भी इस रोग के होने का करण हो सकते हैं।

चिकित्सा वैज्ञानिकों के मतानुसार - आधुनिक स्त्रियों का यह रोग, सबसे बड़ा शत्रु है। इस रोग की उत्पत्ति अधिक ऐश्वर्य तथा आराम के (विलासितपूर्ण) जीवनयापन से होता है। जो स्त्रियाँ घरों में कोई काम नहीं करती हैं अथवा युवावस्था से ही यौन सम्बन्धों में लिप्त रहकर अधिक मादक द्रव्यों का सेवन करती हैं वे प्रायः इस रोग का शिकार हो जाती हैं। कृत्रिम यौन उपकरणों का प्रयोग, अधिक व्रत/उपवास, अश्लील वातावरण तथा अधिक सन्तान उत्पन्न करना भी इस रोग को उत्पन्न करने के कारण हैं। रोग के प्रकार 

श्वेतप्रदर आमतौर पर नीचे लिखे तीन प्रकार का होता है-

  1. मोनिलिया ल्यूकोरिया - इसमें रोगिणी की योनि से निकलने वाला स्त्राव/ पानी सफेद, दही के समान गाढ़ा व फुटकीदार होता है और रोगिणी की योनि के आस- पास खुजली भी होती है।
  2. ट्रोकोमोनास ल्यूकोरिया - इसमें रोगिणी की योनि से निकलने वाला स्राव / पानी पतला तथा पीले रंग का होता है तथा योनि के आस-पास खुजली भी होती है।
  3. सुजाक (गोनोरिया) के कारण होने वाला ल्यूकोरिया - इसमें रोगिणी की योनि से निकलने वाला स्राव/पानी मवाद वाला और दुर्गन्धित होता है तथा रोगिणी को मूत्र त्याग करने के समय जलन भी होती है।

श्वेतप्रदर रोग चाहें जिस कारण से हो, किन्तु उसकी चिकित्सा कराना अत्यावश्यक है, यहाँ तक कि सामान्य कारणों से होने वाले सामान्य ल्यूकोरिया रोग की भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि रोगिणी को इससे कमजोरी बढ़ती है।

श्वेतप्रदर रोग तथा सामान्य योनि तरलता में अन्तर

  • कई बार ऐसा भी देखने में आता है कि कुछ स्त्रियाँ जानकारी के अभाव में योनि से होने वाले स्वभाविक/प्राकृत स्राव को भी ल्यूकोरिया रोग जान-समझकर चिन्तित हो उठती हैं, इसलिए ल्यूकोरिया तथा सामान्य योनि तरलता में अन्तर को समझना अत्यावश्यक है-
  • सत्यता तो यह है कि प्रकृति ने स्त्रियों के योनि मार्ग को स्वाभाविक/प्राकृतिक रूप से गीलापन तथा तरलता प्रदान की है ताकि मैथुन/सहवास के दौरान सुरक्षा प्राप्ति हो और कोई कष्ट न हो। कई सामान्य शारीरिक व मानसिक क्रियाओं से भी योनि की नमी में वृद्धि हो जाती है। मासिक धर्म के बीच में और मासिक धर्म के अन्त में डिम्बग्रन्थि से डिम्ब छूटने के दिन, गर्भावस्था के दिनों में तथा यौन उत्तेजना के क्षणों में नमी अथवा में वृद्धि हो जाती है, साथ ही वयःसन्धि काल में रजोधर्म आरम्भ होने से पहले यह तरलता बढ़ जाती है। सामान्य स्थितियों में योनि से होने वाला स्राव साफ अथवा दूधिया रंग का होता है। इसमें कोई दुर्गन्ध नहीं होती है किन्तु यदि योनि से सदैव ही स्राव होता रहे, उसका रंग पीला अथवा दही के सदृश हो, योनि में खुजली हो अथवा सूजन हो तो यह रोग (ल्यूकोरिया) के लक्षण हैं।

श्वेतप्रदर रोग होने के मुख्य कारण:-

  1. कुछ परजीवियों का आक्रमण या प्रकोप/संक्रमण प्रमुख हैं यथा - ट्राइकोमोनल व मोनोलियम तथा सुजाक (गोनोरिया) या आतशक/उपदंश (सिफलिस Syphilis) कारण मनोवैज्ञानिक कारण-भय, तनाव, चिन्ता, क्रोध, वैवाहिक जीवन की अनबन, विघटन तथा मानसिक रोगों की उपस्थिति
  2. सामान्य कारण - प्रजननांगों की उचित स्वच्छता का अभाव (सफाई न करना), कुपोषण और अल्प पोषण, शारीरिक सक्रियता का अभाव, खुली हवा व धूप का अभाव, बेमेल विवाह तथा वैवाहिक जीवन का असामंजस्य, अन्तःस्रावी ग्रन्थियों की कार्यप्रणाली में असंगति
  3. असान्य कारण- जीर्णकास, श्वास, मधुमेह, यक्ष्मा (टी०बी०), रक्तदोष, चर्मरोग, सन्धिवात, पाण्डु, कामला रोग तथा आन्त्रकृमि रोग
  4. बालिकाओं को श्वेतप्रदर रोग प्रायः गुदा से निकलकर योनि में प्रवष्टि हो जाने वाले' सूत्रकृमियों' गन्दगी, शीतल प्रकृति की चीजों का अत्याधिक सेवन, ठण्डे स्थान पर अधिक समय तक बैठने तथा नीचे के कपड़े निरन्तर गीले रहने से भी हो जाया करता है।
  5. उत्तेजक कारण - मासिक धर्म में अनियमितता, जल्द-जल्द प्रसव, गर्भपात, अत्याधिक मैथुन, कृत्रिम गर्भ निरोधक उपाय, गर्भाशय का आंशिक प्रत्यावर्तन, विस्थापन, भ्रंश, गर्भाशय ग्रीवा की विदीर्णता, अर्बुद, पुटी, कैंसर, पॉलिप, शीत उपचार प्रभाव युक्त तथा क्षोभक औषधियों का बहुत अधिक मात्रा में सेवन ।
  6. अन्तः गर्भाशय कलाशोथ, योनिशोथ, व्रण आदि 'शोथज कारणों' से भी
  7. अश्लील साहित्य का पठन-पाठन, ब्लू फिल्में देखना, तीव्र औषधियों का योनि में रखना, अधिक डूश करने, योनि में गन्दी अंगुली का बार-बार प्रवेश, कब्ज, अजीर्ण, अत्याधिक परिश्रम करना, कम आयु में गर्भधारण करना, अतृप्त कामेच्छा आदि भी इस रोग के कारणों में सम्मिलित हैं।

श्वेतप्रदर रोग के मुख्य लक्षण:-

  1.  रोग के प्रारम्भ में रोगिणी को शारीरिक निर्बलता की अनुभूति होती है।
  2.  रक्ताल्पता के कारण बार-बार चक्कर आना ।
  3. आँखों के सामने अन्धेरा छा जाना।
  4. जी मिचलाना/ उबाकाईयाँ आना ।
  5. बार-बार मूत्र त्याग ।
  6. कब्ज/शौच साफ न होना।
  7. भूख न लगना ।
  8. पेट में भारीपन ।
  9. दर्द तथा कटिशूल (कमर दर्द) ।
  10. श्वास कष्ट तथा मूर्च्छाभाव ।
  11. जंघाओं में भारीपन तथा उनमें खिंचाव सा होने का कष्ट ।
  12. रोग के अधिक समय तक बने रहने की अवस्था में-हृदय के चारों ओर भार तथा आगे चलकर पीड़ा भी होने लग जाना।
  13. रोगिणी का चेहरा दिन-प्रतिदिन पीला सा पड़ने लगना, सौन्दर्य विहीनता । 
  14. योनि में खुजली तदुपरान्त छाछ सदृश अथवा लाल/पीला द्रव (स्राव) निकलने लगना ।
  15. कमर व पैरों की पिण्डलियों में दर्द रहने लगना।
  16. पीठ के निचले भाग (त्रिक प्रदेश) तथा कटि (कमर) में शूल (Pain) जो परिश्रम करने अथवा चलने-फिरने से शर्तिया बढ़ जाता है।
  17. रोगिणी के पहनने वाले अधोवस्त्र - अण्डरवियर, जांघिया, पेटीकोट इत्यादि का सदैव गीला रहना। (जैसे कि किसी ने उसको पानी से भिगो दिया हो । )
  18. रोग वृद्धि हो जाने पर निकलने वाला द्रव/स्राव (डिस्चार्ज) दुर्गन्धित तथा मवाद के रूप में आने लगना ।
  19. दुर्गन्धित योनि ।
  20.  सुस्ती/आलस्य, कमजोरी अधिक व अनुभव होना
  21. मासिक धर्म कष्टप्रद ।
  22. अच्छी/प्राकृत नींद का अभाव ।
  23. चिड़चिड़ा स्वभाव |
  24. मानसिक तनाव |
  25. रोग लक्षणों में मासिक धर्म के समय वृद्धि
  26. यदि किसी विशेष कीटाणु के कारण रोग हो तो बच्चेदानी के मुख और योनि में घाव होकर पीले रंग का झागदार, दुर्गन्धित स्राव बहने लगता है। रोगिणी का स्वास्थ्य और सौन्दर्य दोनों ही नष्ट होने लगते हैं। शरीर में अत्याधिक रक्ताल्पता हो जाती है, कभी-कभी ज्वर भी आने लगता है। सम्पूर्ण शरीर में दर्द तथा हथेलियों और पैरों के तलुवों में जलन होती है।

श्वेतप्रदर/Leucorrhoea रोग की पहचान कैसे करे?

  1. रोगिणी के सामान्य आर्तव और प्रसव सम्बन्धी तथागत औषधिक सम्बन्धी इतिहास की जानकारी के अतिरिक्त उसका सामान्य व सार्वदैहिक तथा स्त्री रोग सम्बन्धी गहनतापूर्वक परीक्षण आवश्यक है।
  2. आर्तव का माइक्रोस्कोपी टेस्ट (सूक्ष्मदर्शी परीक्षा) तथा उसका रसायनिक विश्लेषण भी उसकी प्रकृति को जानने समझने में अत्यन्त सहायक ।रोग के समुचित निदानार्थ रोगिणी की योनि और गर्भाशय ग्रीवा आलेपों की व मल-मूत्र परीक्षा, हीमोग्लोबिन गणना तथा V.D.R.L. की आवश्यकता भी हो सकती है। 
  3. रोग का परिणामसमय से समुचित उपचार करने पर रोग सरलतापूर्वक आराम/ठीक हो जाता है।उपचार में सफलता बहुत कुछ उस पर निर्भर करती है कि रोगिणी का चिकित्सक रोग के स्वरूप और मूल कारण के अन्वेषण में कहाँ तक सफल रहा है।

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